उपन्यास: मैं पागल हूँ
एक ऐसे आदमी की कहानी, जिसे दुनिया समझ नहीं पाई—उसे आज भी अहसास है कि वो पागल है लेकिन किसी को गूंगे की भांति बता नहीं सकता। दुनिया को समझते-समझते वो खुद से दूर होता चला गया ।
अध्याय 1: मेरे पागल होने की कहानी
मैं एक पागल आदमी हूँ।
अब लोग मुझे भगवान भी कहते हैं। अगर ऐसा है, तो यह उन्नति होती। लेकिन उनकी नज़रों में मैं आज भी उतना ही पागल हूँ, जितना पहले था। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले वे मुझ पर हँसते थे और अब कभी-कभी मेरे सामने हाथ जोड़ लेते हैं।
मुझे बुरा नहीं लगता।
सब मुझे अच्छे लगते हैं। यहाँ तक कि वे लोग भी, जो मुझ पर हँसते हैं। जब वे हँसते हैं, तो बड़े प्यारे लगते हैं। उनके चेहरों पर एक ऐसी सहजता होती है, जिसे देखकर मेरा मन करता है कि मैं भी उनके साथ हँसूँ। खूब हँसूँ। इतना हँसूँ कि मेरी आँखों से आँसू निकल आएँ और कोई मुझसे पूछे कि क्या हुआ।
और मैं कह सकूँ—कुछ नहीं, बस अच्छा लग रहा है।
लेकिन मैं हँस नहीं पाता।
वे मुझ पर हँसते हैं, और मैं उनके लिए उदास हो जाता हूँ।
खुद पर नहीं, उनके लिए।
क्योंकि उन्हें पता ही नहीं कि मुझे मालूम है कि मैं एक पागल आदमी हूं। उन्हें लगता है कि उनके सामने एक ऐसा आदमी खड़ा है, जिसका दिमाग ठीक नहीं है। जो कभी आसमान को देखकर मुस्कराने लगता है, कभी किसी छोटे बच्चे की बात पर घंटों सोचता रहता है और कभी किसी ऐसी बात पर रो पड़ता है, जिस पर रोने का कोई कारण दिखाई नहीं देता।
उन्हें लगता है कि मैं दुनिया को ठीक से समझ नहीं पाता।
काश, मैं उन्हें बता पाता कि मेरी परेशानी दुनिया को देखने में नहीं है। मेरी परेशानी यह है कि मैं जो देखता हूँ, उसे किसी और को दिखा नहीं पाता।
सच्चाई को अकेले समझना कितना मुश्किल होता है, यह मुझे बहुत देर से मालूम हुआ।
या शायद बहुत पहले से मालूम था, लेकिन मैं उसे स्वीकार नहीं करना चाहता था।
वे नहीं समझेंगे।
कभी नहीं समझेंगे।
यह बात मैं किसी गुस्से में नहीं कहता। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है। दुनिया से नाराज़ होने के लिए भी तो यह ज़रूरी है कि हम दुनिया से कुछ उम्मीद करें। मैंने उम्मीद करना बहुत पहले छोड़ दिया था।
फिर भी, जब कोई मेरे पास बैठकर मेरी बातें सुनता है, तो मेरे भीतर कहीं एक छोटी-सी इच्छा जागती है।
शायद आज समझ जाए।
शायद आज मैं अपनी बात ठीक से कह पाऊँ।
शायद आज कोई मेरी आँखों में देखकर कह दे कि मैं समझ रहा हूँ तुम्हें।
लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ।
और अब मैं किसी से इसकी उम्मीद भी नहीं करता।
पहले मुझे पागल होने में दुख होता था।
पागल दिखने में नहीं।
दोनों में बहुत अंतर है।
पागल दिखने में मुझे कभी कोई परेशानी नहीं हुई। मैं सड़क पर चलते हुए अचानक रुक जाऊँ, किसी पेड़ से बातें करने लगूँ या बिना किसी कारण हँस दूँ—इन सब बातों से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था। मुझे लोगों की नज़रों से डर नहीं लगता था।
मुझे डर लगता था कि कहीं वे मुझे सचमुच पागल न समझ लें।
तुम सोचोगे कि यह कैसी अजीब बात है। एक आदमी जो पागलों जैसा व्यवहार करता है, उसे इस बात से डर लगता है कि लोग उसे पागल समझेंगे।
लेकिन मेरी परेशानी यही थी।
मैं जानता था कि मैं पागल हूँ।
और मैं यह भी जानता था कि मैं क्यों पागल हूँ।
कम-से-कम उस समय मुझे ऐसा ही लगता था।
यह बात किसी को बताना चाहता था, लेकिन बता नहीं पाता था। कई बार किसी के सामने बैठकर मन बनाया कि आज सब कह दूँगा। जो कुछ मेरे भीतर है, उसे बाहर निकाल दूँगा। चाहे सामने वाला हँसे, चाहे मुझे छोड़कर चला जाए, चाहे मुझे किसी कमरे में बंद करवा दे।
लेकिन जैसे ही बोलने की कोशिश करता, मेरे शब्द मेरा साथ छोड़ देते।
गला सूख जाता।
हाथ ठंडे पड़ जाते।
और फिर मैं कोई ऐसी बात कह देता, जिसका मेरी असली बात से कोई संबंध नहीं होता।
सामने वाला हँस देता।
मैं भी मुस्करा देता।
बात वहीं खत्म हो जाती।
उसके बाद मैं कई दिनों तक खुद को समझाता रहता कि अच्छा हुआ, मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि मुझे डर था कि अगर मैंने किसी को सब कुछ बता दिया, तो शायद उसी दिन खुद को खत्म कर दूँगा।
यह डर भी अजीब था। मैं सच बोलने से डरता था, और सच को अपने भीतर रखने से भी।
धीरे-धीरे यह चुप्पी मेरे भीतर बढ़ती गई।
वह किसी बीमारी की तरह नहीं बढ़ी, जिसका दर्द दिखाई दे। वह एक खाली कमरे की तरह बढ़ी, जिसमें मैं हर दिन थोड़ा और सामान रखता जाता था। बाहर से देखने पर कमरा भरा हुआ लगता, लेकिन भीतर जाने पर पता चलता कि वहाँ रहने की कोई जगह नहीं बची।
मेरे भीतर भी ऐसी ही हालत हो गई थी।
मेरे पास कहने के लिए बहुत कुछ था।
लेकिन कहने की जगह नहीं बची थी।
मैं पाँच साल की उम्र में स्कूल गया था।
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ये बच्चे इतने खुश या इतने दुखी क्यों हैं। जितना विज्ञान सीखता गया, उतना ही पागल बनता गया। कभी-कभी ऐसा लगता था, जैसे विज्ञान की रचना ही मुझे पागल सिद्ध करने के लिए हुई हो। ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही थी। हर बीतते साल के साथ यह यक़ीन और गहरा होता गया कि मैं पागल हूँ।
लेकिन कोई नहीं जानता था कि मैं खुद भी जानता हूँ कि मैं पागल हूँ। और शायद यही बात मुझे सबसे ज़्यादा खलती थी।
गलती मेरी ही थी। मैं किसी को बता नहीं पाता था कि मेरे भीतर क्या चल रहा है। मेरे पास कहने के लिए बहुत कुछ था, लेकिन शब्दों तक पहुँचते-पहुँचते सब कुछ कहीं खो जाता था। मुझे डर था कि अगर मैंने किसी से अपने मन की बात कह दी, तो शायद उसी दिन खुद को खत्म कर दूँगा।
इसलिए मैं चुप रहा।
धीरे-धीरे यह चुप्पी मेरे भीतर बढ़ती गई। वह मेरे विचारों में, मेरी साँसों में, यहाँ तक कि मेरी हँसी में भी उतर आई। बाहर से मैं वही था, लेकिन भीतर एक ऐसी दुनिया बनती जा रही थी, जिसके बारे में किसी को कुछ नहीं मालूम था।
बचपन में भी मुझे इसी बात का डर सताता था—कहीं सच अनजाने में मेरे मुँह से निकल न जाए। मैं लोगों के बीच बैठा रहता, उनकी बातें सुनता, उनके साथ हँसता, लेकिन भीतर कहीं लगातार खुद को रोकता रहता। जैसे मेरे होंठों के पीछे कोई ऐसा रहस्य कैद हो, जिसके बाहर आते ही सब कुछ बदल जाएगा।
मैं नहीं जानता था कि उस सच से मुझे ज़्यादा डर लगता था या उस दिन से, जब कोई उसे सुनकर मेरी आँखों में देखता और कहता—तुम सचमुच विज्ञान सीखकर पागल हो गए।
- अरुण सिंह चमियाल (TENZIN)

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