अध्याय 2 छह जून की सुबह जब बच्चा था, तब मुझे डर लगता था कि कहीं यह सच मेरे मुँह से निकल न जाए। मैं डरता था कि अगर मैंने वह बात किसी को बता दी, तो लोग मुझे समझ नहीं पाएँगे। शायद वे मुझ पर हँसेंगे, शा…
उपन्यास: मैं पागल हूँ एक ऐसे आदमी की कहानी, जिसे दुनिया समझ नहीं पाई—उसे आज भी अहसास है कि वो पागल है लेकिन किसी को गूंगे की भांति बता नहीं सकता। दुनिया को समझते-समझते वो खुद से दूर होता चला गया । अ…
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