उपन्यास "अपरिचित जुर्म" अध्याय प्रथम

 बुद्ध अगर एक शाम के लिए वापिस आ जाते तो मैं कहता कि आपके मार्ग पर चल रहे लोग बहुत खूबसूरत होते अगर मैं अपने भीतर के दुःख को समझ पाता। ऐसा लगता है कि इस धम्म के मार्ग की तस्वीर मेरे भीतर, दुखों के मलबे में दब गई है। बुद्धिस्ट मठों की चकाचौंध का मुकाबला करने वाले आध्यात्मिक गुरु और दलदल की गंदगी में समेटे हुए झुग्गी बस्तियां। मौसम की नीरसता और असंतुलन सुख के अनुभव से संकीर्ण और दुःख के अनुभव से भी चौड़े रास्ते से होकर गुजरती है। एक मनमौजी कलाकार जिसकी कहानियों में हिमालय की बर्फ मिली, रेगिस्तान की बालू मिली और एक दिन उस युवक की कहानी मिली जो रात में फूलने वाले फूलों से भी अधिक उलझन में है। उस लेखक का जीवन हरे भरे खेत से गुजरता हुआ ऊसर और बंजर जमीन तक जा पहुंचता है। सचमुच लगता है कि वह लेखक स्वर्ग से निष्कासित कोई देवता है, जो जीवन में दुख ही दुख देखा करता है। कुछ भी हो लेकिन लेखक का जीवन गांधी पार्क से भी अधिक शांत और सहस्त्रधारा के प्रवाह से भी अधिक गतिमान है। गंगा तट हो या बुद्ध टेंपल, लगता है कि जल की लहरें और हवा की नटखट उसके भीतर के दुखों से तालमेल करके चलती हैं। और अगर आपको डूबने से डर नहीं लगता तो एक दिन आप सहस्त्रधारा घूमने निकल जाएं इस जगह की खूबसूरती कुछ समय के लिए आपको आपके दुःख दर्द भरे जीवन से दूर कर देगी।

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एक ऐसी ही खूबसूरत शाम को मनमौजी कलाकार अरुण अपने पुराने दोस्त वियना से मिला जो पहले एक लड़का था। अब वह फूलों से भी अधिक मासूम लड़की में बदल गई है। वियना “इति पि सो भगवा अरहं सम्मा सम्बुद्धो…” भगवान गौतम बुद्ध के गुणों को गुनगुनाते हुए बोधिसत्वा की तरह गांधी पार्क के छोर पर घूम रही थी। टकसाल के रंग की लंबी स्वेटर, जैतून रंग की ढीली पैंट और पैरों में क्लॉग्स सैंडलें, रुखा सांवला चेहरा और कंधो के ठीक ऊपर तक चमकते हुए सुनहरे छोटे बाल। चलते चलते उसने फूलों का एक गुच्छा एकत्रित कर लिया और उन्हें पुनः पुनः अपने कानों के ऊपर रखती जाती। अरुण के साथ उसकी प्रेमिका खुशबू थी जो बार बार वियना से मिलने की जिद्द कर रही थी।

- क्रमशः 

अरुण सिंह (Tenzin) 



 


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