उपन्यास अपरिचित जुर्म द्वितीय अध्याय

 चीड़ के पेड़ों से सुनहले पराग हवा में बिखर रहे थे "अरे शाम हो गई अरुण अभी तक क्यों नहीं आया?" उसने आश्चर्य से भरकर कहा और पास की एक बेंच पर बैठ गई। वियना ने मन में कहा क्या आज अरुण लाइब्रेरी में होगा। सामने से लाइब्रेरी का ऑनर आ रहा था। "भैया क्या लाइब्रेरी में आपने अरुण को देखा?" "नहीं वियना अरुण आज लाइब्रेरी नहीं आया था।" उसने जवाब दिया। वियना फिर बेचैनी से भरकर फूलों को नोचकर नीचे फेंकने लगी। वह पार्क की हरी घास पर बिछने वाली फूलों की चादर, परतों पर परतें बिछाती जा रही थी और पेड़ की छायाओं का रंग धुंधला होने लगा था। उसकी बेंच के नीचे गुलाब के फूलों की चुनी हुई पंखुड़ियां बिखरी थी। अब उसके पास गुलाब का एक फूल बाकी रह गया था 

अब उसके पास गुलाब का एक फूल बाकी रह गया था। वियना ने उसे धीरे से अपनी उँगलियों में थामा। उसकी आँखों में हल्की बेचैनी और उम्मीद का एक अजीब-सा संगम था। उसने गहरी साँस ली, जैसे खुद को किसी निर्णय के लिए तैयार कर रही हो।

पहली पंखुड़ी तोड़ी—

"वो मुझसे प्यार करता है..."

दूसरी पंखुड़ी—

"वो मुझसे प्यार नहीं करता..."

हवा हल्की-हल्की चल रही थी। चीड़ के पेड़ों से गिरता सुनहरा पराग अब भी आसमान में तैर रहा था, जैसे हर कण उसकी धड़कनों में बस रहा हो।

तीसरी पंखुड़ी—

"वो मुझसे प्यार करता है..."

उसकी आवाज अब धीमी हो गई थी, जैसे हर शब्द के साथ उसका दिल थोड़ा और खुल रहा हो।

चौथी—

"वो मुझसे प्यार नहीं करता..."

उसकी उँगलियाँ काँपने लगीं। आँखें बार-बार पार्क के गेट की ओर उठ जातीं, जैसे किसी चमत्कार की उम्मीद हो। अब आखिरी पंखुड़ी बची थी।

वियना कुछ पल के लिए ठिठक गई। उसकी सांसें तेज हो गईं। उसने आँखें बंद कर लीं… और मन ही मन अरुण का चेहरा उभर आया—वो मुस्कान, वो खामोशी, वो अनकहे शब्द।

धीरे से उसने आखिरी पंखुड़ी तोड़ी—

"वो मुझसे..."

इतने में पीछे से एक आवाज आई—

"वियना!"

उसके हाथ रुक गए। पंखुड़ी हवा में ही ठहर सी गई। वह पलटकर खड़ी हो गई—दिल की धड़कन जैसे कानों में गूंज रही थी… पीछे अरुण और उसकी प्रेमिका खुशबू थी।

“हेलो वियना, शाम को किसका इंतज़ार कर रही हो?” अरुण ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

वियना ने पीछे मुड़कर देखा। एक पल को उसकी आँखें खुशबू पर ठहर गईं—फिर जैसे उसने अपने भीतर कुछ दबा लिया।

“आओ अरुण, बैठो… तुम आज लाइब्रेरी नहीं आए, तो यहाँ बैठकर तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी,”

उसने सब कुछ सामान्य दिखाने की कोशिश करते हुए कहा।अरुण बेंच के एक कोने पर बैठ गया, और खुशबू उसके बिल्कुल पास। वियना ने अपने हाथों में पकड़े गुलाब को धीरे से नीचे रख दिया—अब उसकी सारी पंखुड़ियाँ टूट चुकी थीं।

"यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में था, इसलिए नहीं आ पाया,” अरुण ने सहजता से कहा,

“वैसे… तुम कुछ कहना चाहती थी क्या?”

वियना ने एक पल के लिए उसकी आँखों में देखा। वही आँखें, जिनमें उसने जाने कितने जवाब खोजे थे… "लेकिन तुम तो कब के यूनिवर्सिटी से ड्रॉप आउट कर चुके हो।"

हवा फिर से चली—चीड़ के पेड़ों से गिरता सुनहरा पराग अब उसकी गोद में जमा हो रहा था, जैसे कोई अधूरा सपना चुपचाप बिखर रहा हो।

“नहीं… मैंने एम.ए. में दाखिला लिया है,”

अरुण ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“बस करो… अब क्या यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी चाट डालोगे।” वियना ने गंभीरता से कहा।

खुशबू ने अरुण का हाथ थाम लिया।


क्रमशः 

अरुण सिंह 

(Tenzin)

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