अर्थहीनता के उस पार

मैंने बैठकर दिया जलाया और देर तक उसकी लौ को देखता रहा। मेरे बगल वाले कमरे में एक लड़का रहता था, जो कॉल सेंटर में एजेंट की नौकरी करता था। उसके पास अक्सर अजीब किस्म के लोग आते थे। वे ताश खेलते, नशा करते और कभी-कभी आपस में लड़ने भी लगते थे। पिछले तीन दिनों से वहाँ लगातार हंगामा हो रहा था। मकान मालकिन उन्हें कमरे से निकालना चाहती थी, लेकिन उस लड़के से डरती थी। एक दूसरी किरायेदार भी थी, जो अपने दो बच्चों के साथ रहती थी। वह भी उस एजेंट से डरती थी। आखिरकार उसकी हालत ऐसी हो गई कि उसने कमरा ही खाली कर दिया।

मुझे इन सब बातों से कभी कोई खास फर्क नहीं पड़ा। मैं अपने कमरे में रहता था और अपनी दुनिया में खोया रहता था। मैं रात भर जागता था, मेज पर बैठा रहता था और कुछ नहीं करता था। दिन में पढ़ता और रात में बस बैठा रहता। कभी-कभी घंटों तक एक ही जगह बैठकर सोचता रहता, हालाँकि मुझे खुद भी नहीं पता था कि मैं आखिर सोच क्या रहा हूँ।

उस रात भी मैं अपनी मेज पर बैठा था। मेरे सामने फ्रूट जूस का एक गिलास रखा था, जिसमें मैंने नींद की गोलियाँ मिला दी थीं। मैं उसे देखता रहा। फिर मैंने खुद से एक सवाल पूछा—क्या यह सच है?

मेरे भीतर से आवाज आई—हाँ, यह सच है।

मैंने उसी रात अपनी जान लेने का फैसला कर लिया था।

शायद मैं ऐसा कर भी देता, अगर उस युवती से मेरी मुलाकात न हुई होती।

तुम सोचोगे कि अगर मुझे दुनिया की किसी चीज से कोई मतलब नहीं रह गया था, तो फिर उस युवती का मेरे जीवन में आना इतना महत्त्वपूर्ण क्यों था। लेकिन बात इतनी सरल नहीं थी। 

मुझे भले ही लगता था कि किसी चीज का कोई अर्थ नहीं है, फिर भी मैं दर्द महसूस कर सकता था। अगर कोई मुझे मारता, तो मुझे चोट लगती। अगर कोई दुखद घटना होती, तो मुझे दुःख होता। मेरी भावनाएँ समाप्त नहीं हुई थीं। मैंने केवल यह मान लिया था कि उनके होने या न होने से अंततः कोई फर्क नहीं पड़ता।

पहले भी मुझे दुःख होता था, जब जीवन में चीजें मायने रखती थीं। अब भी दुःख होता था, जबकि मुझे लगता था कि कुछ भी मायने नहीं रखता। अंतर केवल इतना था कि पहले मैं अपने दुःख के पीछे कोई कारण खोजता था, और अब मुझे कारण खोजने की भी आवश्यकता महसूस नहीं होती थी।

लेकिन उस रात मैंने दुःख महसूस किया।

मैं उस युवती की मदद कर सकता था। शायद मुझे उसकी मदद करनी भी चाहिए थी। फिर भी मैंने ऐसा नहीं किया। यह बात मुझे भीतर से परेशान कर रही थी, हालाँकि मैं खुद से बार-बार कह रहा था कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

आखिर मैंने उसकी मदद क्यों नहीं की?

जब वह मुझे अपनी ओर खींच रही थी, तब मेरे मन में एक सवाल उठा था। वह सवाल अपने आप में बहुत साधारण था, बल्कि शायद बेकार भी था। लेकिन मैं उसी में उलझकर रह गया।

मैं सोच रहा था कि अगर मैं उसी रात अपनी जान लेने वाला हूँ, तो फिर कोई भी चीज मुझे क्यों प्रभावित करे? अगर मेरे लिए कुछ ही देर में सब कुछ समाप्त हो जाने वाला है, तो किसी दूसरे का दुःख मेरे लिए महत्त्वपूर्ण क्यों होना चाहिए? मैं उसकी सहायता क्यों करूँ, जब मेरे अपने जीवन का ही कोई अर्थ नहीं रह गया है?

- अरुण सिंह चमियाल (TENZIN)