अध्याय 2 छह जून की सुबह
जब बच्चा था, तब मुझे डर लगता था कि कहीं यह सच मेरे मुँह से निकल न जाए। मैं डरता था कि अगर मैंने वह बात किसी को बता दी, तो लोग मुझे समझ नहीं पाएँगे। शायद वे मुझ पर हँसेंगे, शायद मुझसे दूर भागेंगे, या शायद मेरी आँखों में देखकर उस चीज़ को पहचान लेंगे, जिसे मैं स्वयं भी पूरी तरह नहीं समझता था।
लेकिन युवा होने के बाद मैं शांत हो गया।
क्यों, यह मुझे नहीं पता।
शायद इसलिए कि मेरी चेतना में एक बहुत बड़ा दुख बस गया था। ऐसा दुख, जिसका कोई चेहरा नहीं था, कोई आवाज़ नहीं थी और जिसे किसी दूसरे मनुष्य के सामने शब्दों में रख पाना संभव नहीं था।
वह दुख था यह जानना कि दुनिया में कुछ भी मायने नहीं रखता।
यह आभास मुझे लंबे समय से था। बचपन में भी कभी-कभी मुझे लगता था कि हम सब किसी ऐसी चीज़ के पीछे भाग रहे हैं, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। लोग जन्म लेते हैं, बड़े होते हैं, प्रेम करते हैं, लड़ते हैं, धन कमाते हैं, अपने नाम को अमर बनाने की कोशिश करते हैं और अंत में चले जाते हैं।
उनके जाने के बाद दुनिया कुछ देर के लिए उनका नाम याद रखती है।
फिर वह भी भूल जाती है।
पहले मुझे लगता था कि शायद कभी कुछ रहा होगा। कोई आरंभ, कोई कारण, कोई ऐसी घटना जिसने इस संसार को जन्म दिया होगा। मैं सोचता था कि भले ही आज सब कुछ निरर्थक दिखाई देता हो, लेकिन कभी न कभी किसी चीज़ का अर्थ अवश्य रहा होगा।
फिर एक दिन मेरी समझ में आया कि शायद पहले भी कुछ नहीं था।
और भविष्य में भी कुछ नहीं होगा।
यह विचार मेरे भीतर अचानक नहीं आया था। वह लंबे समय से मेरे भीतर पल रहा था, जैसे किसी बंद कमरे में धीरे-धीरे अँधेरा जमा होता रहता है। फिर एक दिन आदमी दरवाज़ा खोलता है और उसे पता चलता है कि कमरे में रोशनी बची ही नहीं।
पिछले साल यह विचार मेरे भीतर पूरी तरह स्पष्ट हो गया।
मैंने महसूस किया कि यह सब व्यर्थ है।
यह संसार, इसकी सारी भाग-दौड़, लोगों की इच्छाएँ, उनके भय, उनकी आशाएँ और उनके सपने—सब कुछ मुझे किसी ऐसे नाटक जैसा लगने लगा, जिसका अंत पहले से तय है, लेकिन जिसके पात्रों को इसकी खबर नहीं है।
मैंने लोगों से नाराज़ होना बंद कर दिया।
पहले उनकी मूर्खता देखकर मुझे क्रोध आता था। उनकी छोटी-छोटी इच्छाएँ, उनका अहंकार, उनका एक-दूसरे को नीचा दिखाने का जुनून मुझे परेशान करता था। मैं सोचता था कि वे इतना सब क्यों करते हैं, जबकि अंत में सब कुछ समाप्त हो जाना है।
लेकिन फिर मैंने उन्हें देखना ही बंद कर दिया।
मैंने उनके बारे में सोचना छोड़ दिया। उनकी बातों में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया। उनके सुख और दुख मेरे लिए धीरे-धीरे दूर की आवाज़ों जैसे हो गए।
और इसी उदासीनता के भीतर मुझे लगा कि मैंने सच्चाई पा ली है।
मैं गलत था या सही, यह मैं आज भी नहीं जानता।
लेकिन उस सुबह मुझे विश्वास था कि मैं सही हूँ।
वह तारीख छह जून थी।
मुझे तारीख इसलिए याद है क्योंकि उस दिन के बाद मेरे जीवन में जो कुछ हुआ, उसने मेरे भीतर छिपे उस विश्वास को हमेशा के लिए बदल दिया।
बारिश हो रही थी।
सुबह का समय था, लेकिन आसमान पर बादल इतने घने थे कि दिन भी रात जैसा लग रहा था। सड़कें गीली थीं। पेड़ों की पत्तियों से पानी टपक रहा था और हवा में ऐसी ठंडक थी, जो हड्डियों तक उतर जाती है।
मैं अकेला खड़ा आसमान देख रहा था।
बादलों के बीच एक तारा टूट रहा था।
मैं देर तक उसे देखता रहा। उसकी चमक कुछ ही क्षणों में लुप्त हो गई, लेकिन मैं अपनी आँखें उसी जगह टिकाए रहा, जहाँ वह आखिरी बार दिखाई दिया था।
मुझे लगा कि मनुष्य का जीवन भी शायद ऐसा ही है।
एक क्षण के लिए चमकना, फिर अँधेरे में खो जाना।
उस सुबह मैंने अपना जीवन समाप्त करने का निश्चय कर लिया था।
मैं यह बात किसी से कहना नहीं चाहता था। न ही मुझे किसी से सहायता की अपेक्षा थी। मैंने अपने मन में यह निर्णय कर लिया था कि जब किसी चीज़ का कोई अर्थ नहीं है, तो उसे ढोते रहने का क्या लाभ?
मैं किसी से घृणा नहीं करता था।
मैं किसी से बदला नहीं लेना चाहता था।
मैं केवल इस संसार से बाहर निकल जाना चाहता था, जैसे कोई थका हुआ आदमी किसी ऐसे कमरे से बाहर निकलता है, जहाँ बहुत देर से उसका दम घुट रहा हो।
लेकिन तभी किसी ने मेरी कोहनी पकड़ ली।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
वह एक युवती थी।
उसने पुराने कपड़े पहन रखे थे। उसके सिर पर एक रुमाल बँधा हुआ था, जो बारिश से पूरी तरह भीग चुका था। उसके चेहरे पर पानी की बूँदें थीं और आँखों में ऐसा भय, जिसे देखकर पहली बार मुझे अपने विचारों से बाहर किसी दूसरे मनुष्य की उपस्थिति का एहसास हुआ।
वह काँप रही थी।
उसकी उँगलियाँ मेरी कोहनी को कसकर पकड़े हुए थीं, मानो मैं ही इस संसार में उसका आखिरी सहारा हूँ।
वह रो रही थी।
उसने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन उसके शब्द टूट रहे थे। वह इतनी घबराई हुई थी कि उसकी बात ठीक से समझना मुश्किल था।
फिर भी मैं समझ गया।
उसका भाई बीमार था।
उसे मदद चाहिए थी।
वह किसी ऐसे व्यक्ति को खोज रही थी, जो उसके साथ चले, उसकी बात सुने, उसके भाई को अस्पताल पहुँचाने में सहायता करे। शायद उसने मुझे देखकर सोचा था कि मैं उसकी मदद कर सकता हूँ।
वह मेरे सामने खड़ी रोती रही।
मैं उसे देखता रहा।
मेरे भीतर कोई विशेष भावना नहीं उठी।
न दया।
न चिंता।
न कोई जिम्मेदारी।
मैंने उससे कुछ नहीं कहा और आगे चल दिया।
मुझे लगा कि उसका दुख उसकी अपनी समस्या है। संसार में हर मनुष्य अपने दुख के साथ अकेला है। किसी एक व्यक्ति की सहायता करने से क्या बदल जाएगा? यदि उसका भाई बच भी गया, तो एक दिन उसे भी मरना होगा। यदि वह मर गया, तो कुछ समय बाद उसकी बहन भी अपनी जिंदगी में लौट जाएगी।
मेरे लिए यह सब एक ही बात के अलग-अलग रूप थे।
लेकिन वह युवती मेरे पीछे चलती रही।
उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। वह बारिश में मेरे साथ दौड़ने की कोशिश कर रही थी। बार-बार मेरी कोहनी पकड़ती, कुछ कहती और फिर रोने लगती।
मैंने उसे समझाने की कोशिश की।
मैंने कहा कि किसी अस्पताल जाओ।
वह मेरी बात सुनती हुई भी जैसे उसे समझ नहीं पा रही थी। या शायद समझ रही थी, लेकिन उसे केवल इतना चाहिए था कि मैं उसके साथ चलूँ।
मैं आगे बढ़ता रहा।
वह पीछे आती रही।
उसकी आवाज़ बारिश के शोर में घुलती जा रही थी।
आखिरकार मेरा धैर्य टूट गया।
मैंने झटके से अपना हाथ छुड़ाया और उस पर चिल्ला पड़ा।
वह सहमकर पीछे हट गई।
कुछ क्षणों के लिए उसने मुझे ऐसे देखा, जैसे उसे विश्वास ही न हो रहा हो कि मैंने उसके साथ ऐसा किया है।
फिर वह फिर से मेरे पीछे आने लगी।
“साहब… साहब…”
उसकी आवाज़ में अब विनती से अधिक भय था।
मैंने उसकी ओर देखना भी उचित नहीं समझा।
मैंने अपना रास्ता पकड़ लिया।
कुछ दूर जाने के बाद मैंने पीछे मुड़कर देखा। वह अब भी खड़ी थी। बारिश उसके चेहरे पर गिर रही थी और वह इधर-उधर किसी ऐसे व्यक्ति को खोज रही थी, जो उसकी सहायता कर सके।
तभी उसे एक दूसरा आदमी दिखाई दिया।
वह तुरंत उसकी तरफ भागी।
मैंने देखा कि उसने उस आदमी का हाथ पकड़ लिया। वह उससे कुछ कह रही थी। वह आदमी पहले रुका, फिर उसके साथ चल पड़ा।
मैं कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा।
फिर अपने कमरे की ओर बढ़ गया।
मेरा कमरा छोटा और साधारण था। उसमें एक बिस्तर, एक मेज, एक कुर्सी और दीवार के पास रखी कुछ पुरानी किताबें थीं। खिड़की से बाहर एक संकरी सड़क दिखाई देती थी, जहाँ बारिश का पानी धीरे-धीरे बह रहा था।
- अरुण सिंह चमियाल (TENZIN)

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