अध्याय 4  एक पागल आदमी का सपना

क्यों यह सोच मुझे उस युवती पर दया करने से नहीं रोक सकी? मैंने गुस्से में उसे डाँट दिया, मानो उसे यह बताना चाहता हूँ कि मैं अमानवीय भी बन सकता हूँ। अब सोचता हूँ कि शायद मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि मेरे भीतर यह भ्रम पैदा हो गया था कि सब कुछ मुझ पर निर्भर करता है। यह दुनिया मेरी चेतना का ही हिस्सा है और इसके बाहर कुछ भी ऐसा नहीं है जिसका मुझसे स्वतंत्र अस्तित्व हो।

इन्हीं विचारों के बीच मेरे मन में एक नया प्रश्न आया। यदि मैं सपने में बिना किसी को बताए कोई शर्मनाक काम करूँ और जागने के बाद मुझे याद भी न रहे कि मैंने ऐसा सपना देखा था, तो क्या मुझे उस काम पर शर्म आएगी? सपने आते कहाँ से हैं? क्या सपने हमारे मन की इच्छाएँ हैं या मस्तिष्क की ऐसी गतिविधियाँ, जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता?

ये प्रश्न शायद बेकार थे, क्योंकि मेरे सामने नींद की गोलियों वाला शर्बत रखा था। मैं अपनी जिंदगी समाप्त करने के बारे में सोच रहा था, लेकिन इन सवालों ने मुझे बेचैन कर दिया। मैंने तय कर लिया कि मैं इनके उत्तर खोजे बिना नहीं सोऊँगा।

उस युवती ने अनजाने में मुझे बचा लिया था।

मैंने शर्बत पीने का अपना इरादा टाल दिया। बाहर कॉल सेंटर में काम करने वाले उस लड़के के कमरे से अब कोई आवाज नहीं आ रही थी। शायद वह रात की ड्यूटी करके सोने की तैयारी कर रहा था। मैं अपने बिस्तर पर बैठा रहा। फिर न जाने कब मेरी आँख लग गई।

यह पहली बार था जब मैं इस तरह सो गया था।

मुझे हमेशा से लगता था कि कोई मेरे दिमाग में चिप लगाकर मुझे सपने दिखाता है। मेरे लिए सपने एक रहस्य थे। मैं सोचता था कि सपने दिल की सुनते हैं, दिमाग की नहीं, फिर भी सपनों में हमारा मस्तिष्क ऐसी-ऐसी घटनाएँ कैसे रच लेता है, जिनकी हम जागते हुए कल्पना भी नहीं कर सकते?

उस रात मैंने अपने नाना को सपने में देखा। उन्हें मरे हुए लगभग दस साल हो चुके थे। सपने में मुझे यह मालूम था कि वे मर चुके हैं, फिर भी उन्हें अपने सामने देखकर मुझे कोई हैरानी नहीं हुई।

ऐसा कैसे हो सकता था?

अब मैं अपना सपना शुरू करता हूँ।

 छह जून की सुबह

मैंने यह सपना छह जून की सुबह देखा था।

लोग मुझसे कहते हैं कि वह बस एक सपना था। सपने अपने आप आते हैं और हमें भी अपने आप दिखाई देते हैं। लेकिन मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि यदि किसी सपने ने मुझे कोई सच्चाई दिखाई हो, तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह सपना किसी ने दिखाया था या अपने आप आया था? यदि किसी अनुभव से मुझे कुछ ऐसा समझ में आ जाए जिसे मैं पहले नहीं समझता था, तो क्या केवल सपना होने के कारण उसका महत्व समाप्त हो जाता है?

मेरे सपने ने मुझे एक नई जिंदगी दिखाई थी। वह जिंदगी खूबसूरत थी, लेकिन उसका अंत भयानक था।

जैसा कि मैंने बताया, मैं अनजाने में सो गया था। सपने में मैंने देखा कि मैंने वह शर्बत पी लिया है।

पहले मैंने सोचा था कि एक ही झटके में पूरा गिलास खाली कर दूँगा। लेकिन सपने में मैं उसे धीरे-धीरे पीने लगा, जैसे उसके स्वाद का आनंद ले रहा हूँ।

कुछ ही देर बाद मेरे आसपास की दुनिया बदलने लगी। दीवारें हिलने लगीं। कमरा काँपने लगा। मुझे चक्कर आने लगे। मैं एक जगह लेटा हुआ था और मेरा शरीर मेरा साथ नहीं दे रहा था। मैं उठना चाहता था, लेकिन उठ नहीं पा रहा था। मैं कुछ कहना चाहता था, लेकिन मेरी आवाज नहीं निकल रही थी।

धीरे-धीरे मुझे लगा कि मैं मर रहा हूँ।

मैंने अपनी मृत्यु स्वीकार कर ली।

अचानक मुझे अनुभव हुआ कि मैं अपने शरीर से बाहर आ गया हूँ। मैंने नीचे देखा। मेरा शरीर कमरे में पड़ा था। मैं स्वयं को मरा हुआ देख रहा था।

मुझे नहीं मालूम कि कितना समय बीत गया। एक मिनट, एक घंटा या कई दिन। समय का अनुभव जैसे समाप्त हो गया था।

फिर मेरे माता-पिता वहाँ आए। वे रो रहे थे। मैं उन्हें देख सकता था, लेकिन उनसे कुछ कह नहीं सकता था। मैं उनके पास जाना चाहता था, उन्हें बताना चाहता था कि मैं यहीं हूँ, लेकिन मेरी उपस्थिति का उन्हें कोई एहसास नहीं था।

कुछ देर बाद वे चले गए।

फिर मुझे श्मशान ले जाया गया और मेरा शरीर जला दिया गया।

मैं उसी श्मशान में भटकता रहा। वहाँ बारिश हो रही थी। मैं अकेला था और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब मुझे क्या करना चाहिए।

मैंने आकाश की ओर देखा और किसी अनजान शक्ति को पुकारा।

“अगर तुम हो और अगर इस जीवन से बेहतर भी कुछ हो सकता है, तो इसे बदल दो। अगर तुम मुझे इस बेकार जिंदगी के लिए सजा दे रहे हो, तो मुझे इसकी परवाह नहीं। मैं पहले ही सब कुछ खो चुका हूँ।”

मेरे शब्दों का कोई उत्तर नहीं आया।

लेकिन तभी मुझे अपने सामने कुछ दिखाई दिया।

देश के वैज्ञानिकों का एक विशाल काफिला वहाँ मौजूद था। आकाश में सूरज अब भी चमक रहा था। मुझे समझ नहीं आया कि मैं यह सब कैसे देख पा रहा था। क्या यह सब मेरी कल्पना थी? क्या मृत्यु के बाद भी चेतना किसी तरह काम कर सकती है? या मेरा मस्तिष्क मेरे लिए एक ऐसी दुनिया बना रहा था, जिसमें हर घटना वास्तविक लग रही थी?

मैं इन प्रश्नों का उत्तर खोज ही रहा था कि मुझे तेज प्रकाश दिखाई दिया।

एक विशाल रॉकेट आकाश की ओर बढ़ रहा था।

उसमें बैठकर मैं अंतरिक्ष में चला गया।

 विज्ञान का अंत

अंतरिक्ष में पहुँचकर मैंने एक टूटता हुआ तारा देखा। उसके बाद जो कुछ हुआ, उसने मेरे सपने को एक ऐसी दिशा दे दी जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी।

मैं एक दूसरी दुनिया में पहुँच चुका था।

वहाँ की सभ्यता विज्ञान में हमारी दुनिया से लाखों कदम आगे थी। उनके पास ऐसी तकनीक थी जिसके बारे में हमारी दुनिया के वैज्ञानिक केवल कल्पना कर सकते थे। उन्होंने मुझे अपने ब्रह्मांड के बारे में बताया। उन्होंने मुझे दूर-दूर तक फैली आकाशगंगाएँ दिखाईं और ऐसी वैज्ञानिक परियोजनाओं से परिचित कराया जिनके सामने हमारी उपलब्धियाँ बहुत छोटी लगती थीं।

मैं उनकी दुनिया देखकर चकित था।

लेकिन जब मैंने उन्हें अपनी जिंदगी के बारे में बताया, तो वे मेरी बात समझ नहीं पाए। मेरे दुख, मेरी निराशा और जीवन के अर्थ से जुड़े प्रश्न उनके लिए अजीब थे। वे विज्ञान पर विश्वास करते थे और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते थे।

उनकी दुनिया में धर्म का कोई स्थान नहीं था।

मैंने उन्हें अपनी कहानी सुनाई। मैंने बताया कि मनुष्य कभी-कभी अपनी जिंदगी को निरर्थक समझने लगता है। वह अपनी मृत्यु से डरता है और फिर उसी मृत्यु को अपने दुखों का अंत मानने लगता है।

वे मेरी बात सुनते रहे, लेकिन मुझे लगा कि वे मेरी भावनाओं को समझ नहीं पा रहे थे।

मैंने अनजाने में उनकी दुनिया को बर्बाद कर दिया।

मेरी बातों के बाद उनमें ईश्वर को जानने की इच्छा पैदा हुई। उन्होंने विज्ञान के स्थान पर आस्था को महत्व देना शुरू कर दिया। पहले उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व पर चर्चा की, फिर ईश्वर की पूजा करने लगे। धीरे-धीरे धर्म पैदा हुए और धर्मों के साथ अलग-अलग समूह बनने लगे।

हर समूह का अपना ईश्वर था। हर समूह अपने विश्वास को सत्य मानने लगा।

उन्होंने ईश्वर की मूर्तियाँ बनाईं, मंदिर बनाए और अपने-अपने धर्म के झंडे उठाने लगे। वे दुख को अपनाने लगे और कहने लगे कि सत्य तक पहुँचने का रास्ता दुख से होकर जाता है।

विज्ञान, जिसने उन्हें ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने में सहायता की थी, अब उनके लिए संदेह का विषय बन गया।

जब कोई वैज्ञानिक उन्हें उनके पुराने ज्ञान की याद दिलाता, तो वे उसे झूठा और मक्कार कहते। उनका तर्क था कि विज्ञान मनुष्य को भटका सकता है, लेकिन उनका ईश्वर उन्हें सही रास्ता दिखाएगा।

वे कहते थे कि सत्य विज्ञान से ऊपर है।

मैंने देखा कि जिन लोगों के पास ब्रह्मांड को समझने की क्षमता थी, वे अब अपने ही ज्ञान को अस्वीकार कर रहे थे। वे प्रमाणों से अधिक अपने विश्वासों पर भरोसा करने लगे थे। जो उनके धर्म से सहमत नहीं था, उसे वे शत्रु समझने लगे।

फिर उनके बीच युद्ध शुरू हो गए।

कुछ संत सामने आए। उन्होंने लोगों को एकजुट करने और उनके बीच शांति स्थापित करने की कोशिश की। लेकिन उनके विचारों को भी अलग-अलग धर्मों ने अपने अनुसार समझना शुरू कर दिया। जिन विचारों का उद्देश्य लोगों को जोड़ना था, वे भी विवाद का कारण बन गए।

मैं उस दुनिया में घूमता रहा और अपनी आँखों से उसका पतन देखता रहा।

मुझे लगा कि यह सब मेरी गलती थी। मैंने ही उन्हें ईश्वर पर विश्वास करना सिखाया था। मैंने ही उन्हें अपनी जिंदगी का अर्थ खोजने के लिए प्रेरित किया था। मैं नहीं जानता था कि अर्थ की खोज उन्हें अपने ज्ञान से दूर कर देगी।

मैंने लोगों के सामने स्वीकार किया कि मैं दोषी हूँ।

“मुझे सूली पर चढ़ा दो,” मैंने उनसे कहा। “यह सब मेरी गलती है।”

लोग मुझे देखकर हँसने लगे।

उन्होंने कहा कि भगवान का संत पागल हो गया है।

और उसी क्षण मेरा सपना टूट गया।

मैं अचानक जाग गया।

मेरे सामने शर्बत का गिलास रखा था। मैं घबरा गया और मैंने उसे दूर फेंक दिया।

मुझे जिंदगी चाहिए थी।

कुछ देर पहले तक मैं अपनी मृत्यु चाहता था। अब मैं उस दुनिया में वापस नहीं जाना चाहता था जहाँ मैंने स्वयं को मरते हुए देखा था। मुझे नहीं मालूम था कि मैंने जो अनुभव किया, वह केवल सपना था या मेरे मस्तिष्क की कोई ऐसी रचना जिसने मुझे मृत्यु का एहसास करा दिया था। लेकिन उस अनुभव ने मेरे भीतर कुछ बदल दिया था।

मैंने पहली बार महसूस किया कि जिंदगी को समाप्त कर देने से मेरे प्रश्न समाप्त नहीं होंगे। शायद मैं उनके उत्तर कभी नहीं जान पाऊँगा। मैं उस दुनिया में वापस नहीं जाना चाहता था जहां विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली थी। कि मैंने अपने ज्ञान को बताने के लिए उस दुनिया को बर्बाद कर दिया।

मैंने अपने कमरे में चारों ओर देखा। वही दीवारें थीं, वही बिस्तर था और वही कमरा था जिसमें मैं कुछ देर पहले अपनी मृत्यु की कल्पना कर रहा था। फिर भी मुझे सब कुछ अलग लग रहा था।

मेरे सपने की दुनिया में विज्ञान इतना आगे था कि मनुष्य ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने लगा था। लेकिन जब वहाँ के लोगों ने अपने विश्वासों को ज्ञान से ऊपर रखना शुरू किया, तो उन्होंने अपनी ही सभ्यता को नष्ट कर दिया।

मैंने सोचा कि क्या यह केवल एक कल्पना थी या मनुष्य की प्रकृति के बारे में मेरी कोई आशंका?

क्या हम सत्य की खोज इसलिए करते हैं कि हमें सत्य चाहिए, या इसलिए कि हम अपने जीवन को कोई अर्थ देना चाहते हैं?

और यदि हमारा विश्वास हमें किसी ऐसी बात को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दे जो प्रमाणों के विरुद्ध है, तो क्या हमें अपने विश्वास पर संदेह करने का साहस होगा?

मैं इन सवालों के उत्तर नहीं जानता था। लेकिन अब मैं उन्हें समझने के लिए जीवित रहना चाहता था।

मुझे उस युवती की याद आई।

मैंने सोचा कि जिस समय मैं अपनी चेतना और ब्रह्मांड के रहस्यों में उलझा हुआ था, उस समय उसने मुझे एक ऐसी बात सिखा दी थी जिसे मैं समझ नहीं पाया था। उसके सामने भी दुख था, लेकिन उसने अपने दुख के कारण दूसरों के प्रति दया करना नहीं छोड़ा था।

मैंने उसे खोजने का निर्णय लिया।

जब मैं उससे मिला, तो मैंने उससे कहा, “तुमने मुझे बचा लिया।”

वह मेरी ओर देखकर हैरान हुई।

- अरुण सिंह चमियाल (TENZIN)