उपन्यास "अपरिचित जुर्म" तृतीय अध्याय

खुशबू ने अरुण का हाथ थाम लिया। अरुण ने वियना की ओर हल्की मुस्कान के साथ देखा और कहा,

“तुम इतना गुस्सा क्यों कर रही हो, वियना? खुशबू को देखो… वो तुमसे मिलने के लिए बेचैन थी। देखो आज वो दिन आ ही गया जब खुशबू तुमसे मिली।”

वियना ने कुछ पल चुप रहकर खुशबू की तरफ देखा, फिर हल्की सी मुस्कान लाई—

“अच्छा… तो ये इंतज़ार मेरे लिए था?”

वियना ने खुशबू की ओर देखते हुए हल्के स्वर में कहा, “वैसे… अपना परिचय तो दोगी?”

खुशबू ने मुस्कुराते हुए अपने बालों को कान के पीछे किया और बोली,

“मैं खुशबू… एक बुद्धिस्ट स्कॉलर...। और अरुण से तुम्हारे बारे में… मैंने बहुत कुछ सुना है।”

“बहुत अच्छे… तो आज तुम अरुण को घुमाने पार्क में आई हो?”

वियना ने अजीब-से स्वर में कहा।

अरुण हल्के से हँस पड़ा, जैसे बात को सहज बनाना चाहता हो।

“कुछ भी… खुशबू को बचाते हुए..। यार तुम तो जानती हो ना… मेरा बुद्धिज़्म से कितना निकट संबंध है। जब से मैं देहरादून में हूँ… उन्हीं के सहारे हूँ, और आजकल तो… उन्हीं के खर्च पर पढ़ता-लिखता भी हूँ।”

वियना हल्के से मुस्कुराई, फिर धीमे स्वर में बोली।

“अरे अरुण… क्या मैं बौद्ध धर्म से अनजान हूँ? ऐसे लोगों से बेहतर इंसान मिलना मुश्किल होते हैं… तुम बेवजह सफाई दे रहे हो।”

“एक बात तो मैं मानती हूँ, अरुण…” वियना ने हल्की गंभीरता से कहा,

“तुम्हारी पढ़ाई का सारा श्रेय उन बुद्धिस्ट मठों को ही जाता है। तुम्हारे घर वाले तो बस सीमित खर्चा ही भेजते हैं।”

वह थोड़ी देर रुकी, फिर उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी कसक घुल गई।

“वैसे… तुम्हारी पढ़ाई का खर्चा मैं भी उठा सकती थी। मैं बहुत अमीर हूँ… क्या तुम्हें पता नहीं?”

अरुण ने धीरे से सिर हिलाया—

“नहीं… बात वैसी नहीं है… उनसे कुछ अलग ही सहारा मिल जाता है। समझ लो… उन्होंने किसी न किसी बहाने मेरी मदद कर की है।”

खुशबू ने माहौल को हल्का करने की कोशिश करते हुए कहा।

“अच्छा… चलो, कुछ देर के लिए बुद्धा टेंपल तक ही घूम आते हैं।”

तीनों उठकर बुद्धा टेंपल की ओर चल दिए, जो पार्क से कुछ ही दूरी पर बना हुआ था। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उन्होंने देखा कि एक शख्स मंदिर के किनारे बैठा, बुद्ध की प्रतिमा की ओर एकटक देखता हुआ ध्यान में तल्लीन है।

खुशबू ने धीरे से कहा।

“कोई दुःखी व्यक्ति है… या कोई फिलॉसफर? देखो, अरुण…”

अरुण ने हल्की-सी नजर डाली और बोला। “नहीं… दोनों से भी निकृष्ट कोटि का मनुष्य है।” ये (रवांल्टी) क्षेत्रीय भाषा के कवि हैं एम. ए. में पढ़ाते हैं आओ मिलाएं तुम्हें। अरुण धीरे से उसके पीछे पहुँचा और अपने दोनों हाथों से कवि की आँखें बंद कर लीं। 

रवांल्टा चौंक उठा।

उसने झटके से पीछे मुड़कर देखा, और उसका चेहरा अचानक तमतमा उठा।

“ये क्या बचपना है, अरुण? मैं कितने गंभीर विचारों में डूबा था।” वह बिगड़ते हुए बोला। 


क्रमशः 

अरुण सिंह 

(Tenzin)

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