बिल में कैद आत्मा
एक शाम जब अरुण सिंह अपने डरावने सपने से जागा तो देखा कि वह एक विशाल दैत्याकार चूहे में बदल गया है
अरुण को उस शाम कुछ असामान्य नहीं लगा था। रोज़ की तरह थका हुआ शरीर, बोझिल मन और अनगिनत चिंताएँ—उसी अवस्था में वह बिस्तर पर लेट गया। नींद कब आई, उसे पता ही नहीं चला।
पर जब उसकी आँख खुली, तो संसार बदल चुका था।
वह मनुष्य नहीं रहा था।
वह एक चूहा बन चुका था।
उसका पहला ख्याल था—
“मेरे साथ यह क्या हो गया? अब मुझे नींद नहीं आएगी। मैं पशु बन गया हूँ।”
अब उसका जीवन रात-दिन के श्रम में बदल गया था—रात को खाने की खोज, दिन में बिल खोदना, और हर समय भय में जीना।
“ये मुझे आज क्या हो रहा है?” उसने सोचा।
“क्या यह कोई सपना है?”
कमरे में ऐसा सन्नाटा पसर गया था जैसे उसके भीतर चल रही साँसों की आवाज़ बाहर गूँज रही हो। दैत्याकार चूहा बन जाने के बावजूद, उन साँसों में अब भी एक मनुष्य का कंपन था—सोचने, डरने और समझने वाला मनुष्य।
अरुण एक लेखक था। वह अपनी कहानियाँ फेसबुक और व्हाट्सएप पर साझा करता था—वहाँ, जहाँ शब्द जल्दी पढ़े जाते हैं और उतनी ही जल्दी भुला दिए जाते हैं। लिखना उसके लिए अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि बचाव था; जैसे शब्दों के सहारे वह स्वयं को ज़िंदा रखे हुए हो।
मेज़ पर बुद्ध की एक तस्वीर लगी थी, जिसे उसने हाल ही में एक सचित्र पत्रिका से काटकर निकाला था। बुद्ध की आँखों में शांति थी, पर अरुण को उस शांति तक पहुँचने का कोई मार्ग दिखाई नहीं दे रहा था। उसे लगा जैसे बुद्ध उसे देख रहे हों—न दया से, न करुणा से, बल्कि एक गहरे मौन के साथ।
उसने सोचा, क्यों न कुछ देर और सो लूँ, शायद यह दुःखस्वप्न टूट जाए।
पर नींद अब उसके वश में नहीं थी। वह सोने की कोशिश करता रहा, पर हर प्रयास व्यर्थ था। वर्षों से उसे बाईं करवट सोने की आदत थी, पर अब वह करवट लेने में पूरी तरह असमर्थ था। जैसे ही वह हिलने की कोशिश करता, उसका भारी शरीर लुढ़ककर फिर उसी स्थिति में आ जाता।
यह असहायता केवल शारीरिक नहीं थी। यह उस जीवन की प्रतिछाया थी, जिसमें वह वर्षों से फँसा हुआ था—जहाँ चाहकर भी दिशा नहीं बदल पा रहा था। मन बदलना चाहता था, पर शरीर की तरह मन भी जकड़ा हुआ था। यह केवल उस मनुष्य की शुरुआत थी, जो चूहे के भीतर जाग रहा था।
क्रमशः
- Tenzin Norbu

0 टिप्पणियाँ