अध्याय 2 बंद दरवाज़े के पार
जब हम टूट जाते हैं, तो सबसे पहले हम अपने परिवार की ओर देखते हैं।बिना कहे परिवार से उम्मीद करते हैं कि कोई सहारा उन्हें इस मुश्किल से बाहर निकाल देगा।लेकिन अरुण के हिस्से में दरवाज़ा आया।
कमरे का बंद दरवाज़ा सिर्फ़ लकड़ी का टुकड़ा नहीं था। वह प्यार और नफ़रत के बीच खडी एक दीवार थी।
अंदर अरुण था। बाहर उसका परिवार। और दोनों एक-दूसरे से डर रहे थे। परिवार अरुण के चूहे बन जाने से नहीं डरा था।
वे उसकी ज़िम्मेदारी से डर रहे थे। उस शरीर से, जो अब काम नहीं कर सकता था। उस नाम से, जिससे अब पैसे नहीं आते थे। दरवाज़ा अरुण पर बंद नहीं हुआ था। वह उस आमदनी पर बंद हुआ था। जो अब रुक चुकी थी।अरुण यह समझता था।
चूहे की आँखें तेज़ होती हैं—वे अँधेरे में भी सच्चाई देख लेती हैं।
उसे याद आया जब फोटोग्राफी के उसके काम को एक षड्यंत्र के जरिए बंद करवा दिया गया था।
एक षड्यंत्र—जिसमें किसी का चेहरा साफ़ नहीं दिखता, बस नतीजे दिखते हैं। उस दिन उसकी चेतना चूहे में बदल गई थी।
आज सिर्फ़ शरीर ने उस सच्चाई को मान लिया था। बाहर से माँ की आवाज़ आई।
“अरुण…?”
वही आवाज़,
जो कभी बचपन में उसे बुख़ार से निकाल लाती थी, आज उसके शरीर में सिहरन भर देती थी। हर आवाज़ के साथ एक डर आता था—
क्या वो मुझे नफ़रत से देख रही है?
या घिन से?
जब आपको लगने लगे कि आपका होना। किसी और की मुश्किल बढ़ा रहा है—
उससे बड़ा दर्द कोई नहीं होता। अरुण कमरे के एक कोने में सिमट गया। अब वह कमरे में फैल नहीं रहा था।वह अपने ही परिवार की चुप्पी के नीचे दबा हुआ था।
हम अक्सर समझते हैं कि परिवार हमें हम होने की वजह से प्यार करता है।लेकिन कभी-कभी प्रेम का आधार सिर्फ़ उपयोगिता होता है। जब तक हाथ चलता है, आप कमा रहे हैं तब तक आप “अपने” हैं।
अरुण को लगता था—
वह एक अच्छा बेटा है। एक अच्छा भाई। उसने अपनी जवानी ईएमआई, इलाज और दूसरों के सपनों में खपा दी थी। उसके अपने सपने हमेशा “अगले महीने” पर टाल दिए गए। वह कर्ज़ चुकाता रहा,
सिर्फ़ पैसों का नहीं—
उम्मीदों का, फ़र्ज़ का, और उस अदृश्य समझौते का जो परिवार में बिना उसके दस्तख़त के होता है। उसे एक मशीन की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था और उसके लिए भी एक और मशीन ढूंढी जा रही थी।
बंद दरवाज़े के उस पार आज कुछ टूट रहा था।
“हमारे पास सेविंग तो है…”
किसी ने धीमे से कहा।
“पर अभी क्यों इस्तेमाल करें?”
दूसरी आवाज़ आई।
अरुण का शरीर काँप गया।—
उनके पास पैसा था। वह कर्ज़ चुकाया जा सकता था।बस उसे बताया नहीं गया था। क्योंकि अगर मशीन को पता चल जाए कि उसके बिना भी काम चल सकता है—
तो वह रुक सकती है। और मशीनों को रुकने की इजाज़त नहीं होती।
उस पल अरुण को समझ आया—
वह उस घर का हिस्सा नहीं था। वह उस घर की इनवेस्टमेंट था।
और अब…
वह इनवेस्टमेंट डूब चुका था। इसलिए अरुण के परिवालों में डर और नफरत थी। उसका पशु बन जाना कोई हादसा नहीं था। यह कोई सज़ा भी नहीं थी।
यह तो बस सच का सामने आ जाना था। इंसान रहते हुए जिसे वह समझ नहीं पाया, चूहे बनकर वह साफ़ देख रहा था। क्योंकि चूहा भावनाओं से नहीं, हिसाब से जीता है।
क्रमशः
- अरुण चमियाल


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