अध्याय 3 उपयोगिता का प्रेम
सबसे कठिन समय में मनुष्य किसी चमत्कार की नहीं,बस एक इंसान की तलाश करता है—ऐसे किसी हाथ की, जो उसका हाथ पकड़ ले और कहे,“मैं हूँ।” अरुण के लिए वह हाथ उसकी बहन अमृता थी।
शुरू-शुरू में वही
एक थी जो उसके कमरे में आती थी।
घर के बाकी लोग
दरवाज़े के बाहर से ही बातें करते थे,
पर अमृता अंदर आती
थी।
वह अरुण को देखती
थी—
उस तरह नहीं, जैसे कोई किसी घृणित जीव को देखता है।
बल्कि उस तरह, जैसे कोई अब भी एक इंसान को देख रहा हो।
वह उसके लिए खाना
लाती थी।
कमरे की सफाई करती
थी।
कभी-कभी बिना कुछ
कहे बस कुछ देर खड़ी रहती थी।
अरुण को लगता था—
शायद अभी भी
उम्मीद बाकी है।शायद दुनिया पूरी तरह से खत्म नहीं हुई।लेकिन उम्मीदों की भी एक समाप्ति तिथि होती है।धीरे-धीरे अमृता का आना कम होने लगा।उसकी आँखों में
जो करुणा थी,वह असहजता में बदलने लगी।
फिर असहजता…
धीरे-धीरे घृणा
में बदल गई।
अब जब वह कमरे में
आती,
तो उसकी आँखें
ज़्यादा देर तक अरुण पर टिक नहीं पातीं।जैसे वह खुद से ही बचना चाहती हो।
एक दिन…
दरवाज़े के बाहर
से उसकी आवाज़ आई।
वही आवाज़,
जो कभी अरुण का
सहारा थी।पर इस बार वह अलग थी।
“हमें…
इस चीज़ से
छुटकारा पाना होगा।” वह अरुण के बारे
में नहीं कह रही थी।वह कह रही थी—
“इस चीज़ से।”
उस क्षण
अरुण सच में मर
गया।वह अब बोल नहीं सकता था।
वह अपने कमरे में
कैद था। वह सब कुछ समझता था—
अपने परिवार का
डर…
उनकी घृणा…
पर वह जवाब नहीं दे
सकता था। धीरे-धीरे उसकी पहचान मिटने लगी।और अजीब
बात यह थी कि अरुण भी अपनी इंसानी आदतें भूलने लगा था।उसे
अब बिल में रहना और चीज़ों के पीछे छिपने लगा था।
कभी-कभी वह सोफ़े
के नीचे जाकर छिप जाता—
ताकि उसकी शक्ल
देखकर किसी को घिन न आए।
वह वही बन रहा था
जो उसका परिवार
उसे समझने लगा था।
एक पशु।
क्योंकि जब यह
दुनिया बार-बार आपको कहती है
कि आप बेकार हैं…
तो एक दिन
आप भी यह मानने
लगते हैं।
और शायद
उस दिन से आपका
इंसान होना खत्म हो जाता है।
क्रमशः…
- Tenzin

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